वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में तीव्र होते ऊर्जा संकट ने समस्त विश्व समुदाय को वैकल्पिक, सतत एवं पर्यावरण-सम्मत ऊर्जा स्रोतों की खोज हेतु बाध्य कर दिया है। इसी संदर्भ में पशुपालन मंत्री लखन पटेल जी के आवास पर एक उच्चस्तरीय एवं विचारोत्तेजक संगोष्ठी का आयोजन किया गया, जिसमें गौ-आधारित ऊर्जा संसाधनों के विविध आयामों पर गहन मंथन संपन्न हुआ।
संगोष्ठी के केंद्र में गौ-आधारित बायोगैस, गोबर से निर्मित उपले तथा गोबर-आधारित काष्ठ (लकड़ी) जैसे परंपरागत किंतु अत्यंत उपयोगी ऊर्जा स्रोतों की व्यवहार्यता, प्रभावशीलता एवं व्यापक क्रियान्वयन की संभावनाओं पर विशेषज्ञों द्वारा विस्तारपूर्वक विमर्श किया गया।

प्रख्यात गौ-सेवक उत्तम गायकवाड़ ने अपने उद्बोधन में अत्यंत प्रभावपूर्ण शब्दों में प्रतिपादित किया कि “गौ-संरक्षण एवं संवर्धन केवल सांस्कृतिक आस्था का विषय नहीं, अपितु यह राष्ट्रीय सुरक्षा, ऊर्जा आत्मनिर्भरता एवं पर्यावरणीय संतुलन की दृष्टि से भी अत्यंत अनिवार्य है। यदि हम गौ माता के संरक्षण हेतु संकल्पबद्ध हों, तो वह समस्त राष्ट्रीय संकटों से उबारने में सक्षम है। आवश्यकता है प्रत्येक नागरिक के अंत:करण में गौ माता के प्रति कर्तव्यबोध जागृत करने की।”
इस गरिमामयी संगोष्ठी में रक्षा मंत्रालय के सलाहकार लेफ्टिनेंट चंद्रभान डांगीजी, राष्ट्रीय जीव-जंतु कल्याण बोर्ड के सुनील मानसिंहका जी, युवा व्यवसायी प्रतीक गलफट, योगेश द्विवेदी सहित अनेक प्रतिष्ठित कृषि वैज्ञानिक, उन्नत कृषक एवं विभिन्न सामाजिक संस्थाओं के प्रमुख कार्यकर्ता उपस्थित रहे।
साथ ही संगोष्ठी में क्षेत्रीय स्तर के कई अन्य समाजसेवी, गौ-सेवक एवं जागरूक नागरिकों की सक्रिय भागीदारी रही, जिन्होंने अपने-अपने अनुभव एवं सुझाव प्रस्तुत कर विमर्श को और अधिक समृद्ध बनाया।
विशेषज्ञों द्वारा यह मत व्यक्त किया गया कि गौ-आधारित ऊर्जा न केवल कार्बन उत्सर्जन में कमी लाने में सहायक है, अपितु यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था के पुनरुत्थान, रोजगार सृजन एवं सतत विकास लक्ष्यों की प्राप्ति में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

संगोष्ठी के निष्कर्षस्वरूप यह अभिमत उभरकर सामने आया कि यदि गौ-आधारित ऊर्जा संसाधनों को योजनाबद्ध एवं वैज्ञानिक पद्धति से राष्ट्रीय स्तर पर प्रोत्साहित किया जाए, तो भारत ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में एक सशक्त एवं स्थायी कदम अग्रसर कर सकता है।
यह संगोष्ठी निस्संदेह ऊर्जा संकट के समाधान की दिशा में एक दूरदर्शी पहल सिद्ध हुई, साथ ही इसने गौ-संरक्षण के महत्व को नवीन दृष्टिकोण से स्थापित करते हुए सतत विकास की अवधारणा को सुदृढ़ आधार प्रदान किया।