जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय जबलपुर, मध्यप्रदेश गौ संवर्धन बोर्ड,तथा देशी गौवंश रक्षण एवं संवर्धन न्यास के संयुक्त तत्वावधान में महाकौशल प्रांत में 17 एवं 18 जनवरी 2026
“आधुनिक संस्कृति में भारतीय गौवंश का महत्व एवं भारतीय देशी नस्लों की श्रेष्ठता” विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय स्तर का चिंतन-मंथन आयोजित किया गया। यह आयोजन केवल एक संगोष्ठी नहीं बल्कि भारतीय कृषि, संस्कृति और अर्थव्यवस्था के पुनर्जागरण का वैचारिक मंच सिद्ध हुआ।

इस विचार मंथन में भारतीय कृषि में गोबर-गोमूत्र के विशेष उपयोग, रासायनिक खादों से हो रहे गंभीर नुकसान, भारतीय गौवंश की निरंतर घटती संख्या, देशी नस्लों की वैज्ञानिक श्रेष्ठता तथा गोबर-गोमूत्र आधारित रोजगार सृजन जैसे विषयों पर गहन विमर्श हुआ। कार्यक्रम में राष्ट्रीय जीव-जंतु बोर्ड के सदस्य डॉ. सुनील मानसिंहका, क्षेत्रीय गौ सेवा प्रमुख श्री सोहन जी, गायत्री परिवार दक्षिण जोन के गौ सेवक श्री उत्तम गायकवाड, डॉ. नंदिनी, डॉ. जितेंद्र बकने, डॉ. गावस्कर, नेशनल डेयरी बोर्ड से डॉ. गुरुदत्त जी तथा कृषि विश्वविद्यालय जबलपुर के कुलपति सहित अनेक प्रतिष्ठित वैज्ञानिक, विशेषज्ञ एवं गौ सेवक उपस्थित रहे।
डॉ. सुनील मानसिंहका ने अपने संबोधन में बताया कि गोबर और गोमूत्र केवल कृषि के लिए ही नहीं बल्कि मानव जीवन के संपूर्ण स्वास्थ्य तंत्र के लिए वरदान हैं। उन्होंने दैनिक जीवन में गोबर-गोमूत्र के उपयोग, रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने, पर्यावरण संरक्षण तथा जैविक संतुलन बनाए रखने में इसके वैज्ञानिक महत्व को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि गौ आधारित जीवन पद्धति ही भारत को पुनः स्वास्थ्य और समृद्धि की ओर ले जा सकती है।
गौ भक्त श्री उत्तम गायकवाड ने अत्यंत प्रभावशाली शब्दों में कहा कि *भारतीय अर्थव्यवस्था का मेरुदंड गौ माता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि कृषि, दुग्ध उत्पादन, जैविक खाद, पंचगव्य, ग्रामीण रोजगार और पर्यावरण संतुलन—इन सभी का केंद्र गौ माता ही है। यदि भारत को विकसित राष्ट्र बनाना है और सनातन संस्कृति को जीवित रखना है तो हर किसान के द्वार पर गौ माता की उपस्थिति अनिवार्य है। उन्होंने जन जागरण का आह्वान करते हुए कहा कि जो लोग प्रत्यक्ष रूप से गोपालन नहीं कर सकते, वे गौशालाओं या किसानों के यहां एक गौ माता को गोद लेकर उसके पालन-पोषण का व्यय उठाएं। इससे गौशालाओं का मनोबल बढ़ेगा, किसानों को आर्थिक संबल मिलेगा और गौ माता को सड़कों पर छोड़ने की अमानवीय स्थिति समाप्त होगी।

उन्होंने यह भी कहा कि शुद्ध दूध, दही, मक्खन और घी के अभाव में आज की युवा पीढ़ी नशे और कुपोषण की ओर बढ़ रही है। देशी गाय के दूध और पंचगव्य आधारित उत्पाद ही शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य का आधार हैं। गोबर-गोमूत्र के माध्यम से लघु उद्योग स्थापित कर गांव-गांव में रोजगार के अवसर सृजित किए जा सकते हैं, जिससे ग्रामीण भारत आत्मनिर्भर बनेगा।
चिंतन मंथन में यह विचार भी प्रमुखता से सामने आया कि जेलों में बंद कैदियों को गोबर-गोमूत्र आधारित उत्पादों का प्रशिक्षण देकर पुनर्वास की दिशा में सार्थक पहल की जा सकती है। देश के अनेक घुमक्कड़ और वंचित समाज, जिनके पास स्थायी आजीविका के साधन नहीं हैं, उन्हें इस क्षेत्र से जोड़कर सम्मानजनक रोजगार दिया जा सकता है। वक्ताओं ने शासन-प्रशासन से अपील की कि गौ माता के संरक्षण एवं संवर्धन को लेकर ठोस और संवेदनशील नीतियां बनाई जाएं, क्योंकि गौ माता की उपेक्षा अब समाज के लिए गंभीर संकट बनती जा रही है।
लंदन से शिक्षा प्राप्त कर स्वदेश लौटीं कृतिका अग्रवाल एवं डॉ. जितेंद्र बकने ने बताया कि गोबर और गोमूत्र से बने उत्पादों को अमेजॉन, फ्लिपकार्ट तथा मल्टी-मार्केटिंग प्लेटफॉर्म के माध्यम से वैश्विक बाजार तक पहुंचाया जा सकता है। इससे न केवल देशी गौ आधारित उत्पादों को अंतरराष्ट्रीय पहचान मिलेगी, बल्कि हजारों युवाओं और किसानों को रोजगार के नए अवसर प्राप्त होंगे।
कार्यक्रम के समापन पर यह संदेश स्पष्ट रूप से उभरकर सामने आया कि गौ माता केवल आस्था का विषय नहीं बल्कि भारतीय कृषि, ग्रामीण अर्थव्यवस्था, पर्यावरण संरक्षण और रोजगार सृजन की धुरी हैं। गौ आधारित अर्थव्यवस्था ही आत्मनिर्भर भारत की असली नींव है, और देशी गौवंश का संरक्षण ही आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित, स्वस्थ और समृद्ध भारत की गारंटी है।
आधुनिक संस्कृति में भारतीय गौवंश का महत्व एवं देशी नस्लों की श्रेष्ठता

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